छह वर्षों में 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण

उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो / प्रदीप कुमार,
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय का बुघाणी रोड स्थित चित्रा गार्डन पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने का सफल मॉडल बनकर उभरा है। लगभग 3.5 हेक्टेयर बंजर भूमि पर विकसित इस मिश्रित वन ने मात्र छह वर्षों में करीब 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण कर कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन का उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।
विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल के मार्गदर्शन में हैप्रेक के निदेशक डॉ. विजय कांत पुरोहित एवं अनुरक्षण विभाग के सहायक अभियंता महेश डोभाल के प्रयासों से शुरू हुई इस परियोजना के तहत अब यहां 40 से अधिक प्रजातियों के लगभग 2,500 पेड़ विकसित हो चुके हैं। जामुन, शहतूत, आंवला, बेल, बांज, बांस, सेब और खुबानी जैसी स्थानीय एवं फलदार प्रजातियों ने जैव विविधता और हरित आवरण को समृद्ध किया है। डॉ. विजय कांत पुरोहित ने बताया कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण में चित्रा गार्डन में लगभग 23 टन कार्बन संग्रहित पाया गया, जो करीब 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर है। यह वन प्रतिवर्ष लगभग 14 टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस मॉडल को उत्तराखंड की बंजर भूमि पर बड़े पैमाने पर अपनाकर लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड का सुरक्षित भंडारण किया जा सकता है। साथ ही यह परियोजना कार्बन क्रेडिट, जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास की दिशा में भी नई संभावनाएं प्रस्तुत करती है।
विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल के मार्गदर्शन में हैप्रेक के निदेशक डॉ. विजय कांत पुरोहित एवं अनुरक्षण विभाग के सहायक अभियंता महेश डोभाल के प्रयासों से शुरू हुई इस परियोजना के तहत अब यहां 40 से अधिक प्रजातियों के लगभग 2,500 पेड़ विकसित हो चुके हैं। जामुन, शहतूत, आंवला, बेल, बांज, बांस, सेब और खुबानी जैसी स्थानीय एवं फलदार प्रजातियों ने जैव विविधता और हरित आवरण को समृद्ध किया है। डॉ. विजय कांत पुरोहित ने बताया कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण में चित्रा गार्डन में लगभग 23 टन कार्बन संग्रहित पाया गया, जो करीब 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर है। यह वन प्रतिवर्ष लगभग 14 टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस मॉडल को उत्तराखंड की बंजर भूमि पर बड़े पैमाने पर अपनाकर लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड का सुरक्षित भंडारण किया जा सकता है। साथ ही यह परियोजना कार्बन क्रेडिट, जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास की दिशा में भी नई संभावनाएं प्रस्तुत करती है।
