अतीत का प्रतिशोध नहीं, उसे समझा जा सकता है: शशि रंजन

देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में “द डिक्लाइन ऑफ हिंदू सिविलाइजेशन: लेसन्स फ्रॉम द पास्ट” पुस्तक पर विस्तृत चर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुख्य सचिव आनंद वर्द्धन रहे, जबकि अध्यक्षता एन रवि शंकर ने की।
पुस्तक के लेखक शशि रंजन ने कहा कि इतिहास को न तो केवल स्मृति के रूप में और न ही शिकायत के रूप में देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा, “अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, उसे केवल समझा जा सकता है।”
उन्होंने पुस्तक को चार भागों चरमोत्कर्ष, पतन, पराजय और कारणकृमें विभाजित बताते हुए कहा कि यह हिंदू सभ्यता के विभिन्न ऐतिहासिक पहलुओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। चर्चा में प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि आज़ादी के बाद इतिहास को कई बार चयनात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। कार्यक्रम में कौटिल्य के सिद्धांतों, भारतीय गणितीय परंपरा, शून्य के विकास, तथा भारतीय चिकित्सा और कला परंपराओं पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक इतिहास, अस्मिता और बौद्धिक आत्म-नवीनीकरण पर गंभीर संवाद को आगे बढ़ाती है।
