ईमानदारी, अनुशासन और सुशासन की पहचान थे मेजर जनरल बी.सी. खंडूरी : सुमित तिवारी

उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो / राहुल गिरी,
देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता मेजर जनरल से.नि. भुवन चंद्र खंडूरी के निधन से पूरे प्रदेश में शोक की लहर है। श्री राम नाम विश्व बैंक समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित सुमित तिवारी ने बताया कि मेजर जनरल बी.सी. खंडूरीअपनी ईमानदार छवि, अनुशासित कार्यशैली और जनसेवा के प्रति समर्पण के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री के रूप में उन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को गति देकर देश की आधुनिक सड़क संरचना को नई दिशा दी। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त फैसलों से अलग पहचान बनाई। “खंडूरी है जरूरी” नारा उनकी लोकप्रियता और जनविश्वास का प्रतीक बना।
पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड को सैन्य भूमि के नाम से जाना जाता है। जिसके नायक भुवन चंद्र खंडूरी थे। उनकी साफ ईमानदार छवि उन्हें दूसरे नेताओं से अलग बनाती थी। साथ ही उनका अनुशासन भी उनकी छवि की एक पहचान थी. भुवन चंद्र खंडूरी एक खास लिबाज में आम नेता थे। जिन्होंने पहले सेना में सेवाएं दी, देश की सीमाओं की रक्षा की, उसके बाद राजनीति में कदम रखा। राजनीति में आने के बाद आम लोगों की समस्याओं को सुना। उनकी परेशानियों को दूर किया, आज की राजनीति में राजनीति भुवन चंद्र खंडूरी जैसे नाम कम ही होते हैं। यहीं कारण है कि भुवन चंद्र खंडूरी के जाने से हर कोई दुखी है।
पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड को सैन्य भूमि के नाम से जाना जाता है। जिसके नायक भुवन चंद्र खंडूरी थे। उनकी साफ ईमानदार छवि उन्हें दूसरे नेताओं से अलग बनाती थी। साथ ही उनका अनुशासन भी उनकी छवि की एक पहचान थी. भुवन चंद्र खंडूरी एक खास लिबाज में आम नेता थे। जिन्होंने पहले सेना में सेवाएं दी, देश की सीमाओं की रक्षा की, उसके बाद राजनीति में कदम रखा। राजनीति में आने के बाद आम लोगों की समस्याओं को सुना। उनकी परेशानियों को दूर किया, आज की राजनीति में राजनीति भुवन चंद्र खंडूरी जैसे नाम कम ही होते हैं। यहीं कारण है कि भुवन चंद्र खंडूरी के जाने से हर कोई दुखी है।
आधुनिक सड़क संरचना के वास्तुकार
अटल सरकार में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री रहते हुए खंडूरी ने स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना को गति दी। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाली इस महत्वाकांक्षी योजना के सफल क्रियान्वयन में उनकी अहम भूमिका रही। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों तक सड़क पहुंचाने में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा।
उत्तराखंड में सुशासन की मिसाल
खंडूरी दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल पारदर्शिता, जवाबदेही और सख्त प्रशासनिक फैसलों के लिए जाना गया। 2011 में उन्होंने देश के सबसे सख्त लोकायुक्त विधेयकों में से एक पेश किया, जिसमें मुख्यमंत्री को भी जांच के दायरे में रखा गया।
’’खंडूरी है जरूरी’’ बना चुनावी नारा
2011 में भाजपा के सामने राजनीतिक चुनौतियां बढ़ने पर पार्टी नेतृत्व ने दोबारा खंडूरी पर भरोसा जताया। इसी दौरान “खंडूरी है जरूरी” नारा पूरे उत्तराखंड में लोकप्रिय हुआ और 2012 चुनाव में भाजपा ने इसी छवि के साथ चुनाव लड़ा।
सादगी और अनुशासन की विरासत
बी.सी. खंडूरी का जीवन सैन्य अनुशासन, स्वच्छ राजनीति और जनहित के प्रति समर्पण का उदाहरण रहा। उनका योगदान उत्तराखंड और देश की राजनीति में हमेशा स्मरणीय रहेगा।

बीसी खंडूरी का जीवन परिचय
बीसी खंडूरी पौड़ी गढ़वाल के मूल निवासी थे।
1 अक्टूबर 1933 को बीसी खंडूरी का जन्म हुआ।
बीसी खंडूरी दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे।
पहली बार 2007 से 2009 तक और दूसरी बार 2011 से 2012 तक सीएम रहे।
वह पहली बार 8 मार्च 2007 से 27 जून 2009 तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे।
फिर 11 सितंबर 2011 को तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के इस्तीफे के बाद वे वापस उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने।
राजनीति में आने से पहले उन्होंने 1954 से लेकर 1990 तक भारतीय सेना में 36 साल नौकरी की थी।
1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध में वो रेजीमेंट कमांडर रह चुके हैं।
खंडूरीको 1982 में अतिविशिष्ट सेना मेडल से सम्मानित किया गया था।
खंडूरी की पढ़ाई-लिखाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय, सैन्य अभियांत्रिकी महाविद्यालय (सीएमई) पुणे, इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स, नई दिल्ली और रक्षा प्रबंध संस्थान सिकंदराबाद में हुई।
सेवानिवृत्ति के बाद वो राजनीति में आए और 1991 तथा बाद के चुनावों में उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।
1 अक्टूबर 1933 को बीसी खंडूरी का जन्म हुआ।
बीसी खंडूरी दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे।
पहली बार 2007 से 2009 तक और दूसरी बार 2011 से 2012 तक सीएम रहे।
वह पहली बार 8 मार्च 2007 से 27 जून 2009 तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे।
फिर 11 सितंबर 2011 को तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के इस्तीफे के बाद वे वापस उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने।
राजनीति में आने से पहले उन्होंने 1954 से लेकर 1990 तक भारतीय सेना में 36 साल नौकरी की थी।
1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध में वो रेजीमेंट कमांडर रह चुके हैं।
खंडूरीको 1982 में अतिविशिष्ट सेना मेडल से सम्मानित किया गया था।
खंडूरी की पढ़ाई-लिखाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय, सैन्य अभियांत्रिकी महाविद्यालय (सीएमई) पुणे, इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स, नई दिल्ली और रक्षा प्रबंध संस्थान सिकंदराबाद में हुई।
सेवानिवृत्ति के बाद वो राजनीति में आए और 1991 तथा बाद के चुनावों में उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।
