1924 में गंगा किनारे मंचन से हुई थी शुरुआत
 
 
उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो / कुमार दुष्यंत,
 
हरिद्वार। हरिद्वार में आजकल दर्जनों स्थानों पर रामलीलाओं का मंचन हो रहा है। धर्मनगरी की इन रामलीलाओं में हरिद्वार की पुरानी बड़ी रामलीला का अपना अलग स्थान है। 103 साल पूरे कर चुकी इस रामलीला से ही अलग होकर धर्मनगरी में अन्य रंगमंच सजते रहे।
हरिद्वार की इस पुरानी रामलीला की शुरुआत 1924 में गंगा किनारे घाट पर मंचन से हुई थी। जिसमें शुरुआती दौर में ड्रामेटिक पार्टियां और क्लब ही रामलीला मंचन करते रहे। मौसम की विषमताओं और गंगा किनारे की तीव्र ठंड के कारण तब तत्कालीन आयोजकों को जल्द रंगमंच अपररोड़ स्थित नाथों के दलीचे में शिफ्ट करना पड़ा। 1930 में रामलीला हरिद्वार कोतवाली के सामने वर्तमान मैदान में पहुंची, बाद में इस मैदान को रामलीला मैदान के ही नाम से जाना जाने लगा। 1955 से पूर्व तक यहां अस्थाई और फट्टों के स्टेज पर लीला का मंचन होता रहा तत्पश्चात तत्कालीन नगरनिगम चेयरमैन पन्ना लाल भल्ला, समाजसेवी मुल्कराज तालिब, वैध हरनाम दत्त, मूलराज सचदेवा आदि के सहयोग से वर्तमान पक्के भवन की बुनियाद रखी गई, उस समय किसी रामलीला समिति के पास यह अकेला पक्का भवन था। हरिद्वार रामलीला के इस पक्के और बड़े रंगमंच पर तब शौकिया कलाकार अभिनय के लिए लालायित रहते थे।
रामलीला कमेटी से क्योंकि समाज के प्रतिष्ठित और राजनीतिक जगत के लोग संबद्ध थे इसलिए कमेटी पर वर्चस्व के लिए प्रतिद्वंद्विता भी होने लगी। जिससे विघटन भी हुए। 1958 में इसी लीला से अलग होकर पं.रामस्वरूप भारद्वाज व अन्य लोगों ने भीमगोड़ा में अलग रामलीला का मंचन शुरू कर दिया। इसके बाद 1976 में इसी लीला से अलग होकर मायापुर, भूपतवाला व अन्य रंगमंचों का जन्म हुआ। हालांकि इसके समानांतर वाल्मीकि समाज की रामलीला का भी मायादेवी मैदान में आयोजन होता रहा। शहर में आज दर्जनों स्थानों पर लीलाओं का मंचन होता है लेकिन किसी न किसी रूप में इन सभी रंगमंचों का उद्गम हरिद्वार की बड़ी रामलीला का रंगमंच रहा है।
 
1986 में सिमट गई रामलीला 
 
1986 से पूर्व तक हरिद्वार रामलीला के पास आयोजन के लिए पक्के भवन सहित विशाल मैदान भी रहा। तब दूर दराज क्षेत्रों से भी दर्शक ट्रक, ट्रेक्टर लेकर रामलीला देखने हरिद्वार आया करते थे। मैदान के चारों ओर खाने पीने की दुकानें भी सजा करती थी और रावण दहन भी इसी मैदान में हुआ करता था लेकिन 1986 कुंभ में जूना अखाड़े ने मैदान पर अपना दावा कर दिया। इसको लेकर विवाद भी हुए। इसके बाद रामलीला अपने भवन तक सिमट गई। तभी से रावण भी दहन के लिए रोड़ी बेलवाला पहुंचने लगा।
 
 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share
error: Content is protected !!