एकल विद्यालय अभियान: शिक्षा, संस्कार और स्वावलंबन की अनूठी पहल


हल्द्वानी। “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय” के वैदिक मंत्र को जीवन का संकल्प बनाकर उत्तराखंड की बेटी दया पांडा गाँव-गाँव चौपालों के माध्यम से शिक्षा की अलख जगा रही हैं। वह न केवल बच्चों को शिक्षित कर रही हैं, बल्कि समाज में संस्कार, स्वावलंबन और जागरूकता की नई रोशनी भी फैला रही हैं।
एकल विद्यालय फाउंडेशन द्वारा संचालित यह अभियान दूरस्थ, वंचित और आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों तक शिक्षा पहुँचाने का कार्य कर रहा है। अभियान के अंतर्गत “शिक्षा मंदिर” और चौपालों के माध्यम से एक शिक्षक वाले विद्यालय संचालित किए जाते हैं, जिनका उद्देश्य अशिक्षा को समाप्त करना है।
बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र से आने वाली दया पांडा ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त कर समाजसेवा का मार्ग चुना। वर्तमान में संभाग महिला प्रमुख के रूप में वे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा के कई गाँवों में शिक्षा के साथ-साथ योग, आयुर्वेद, नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कारों का प्रसार कर रही हैं। उनका मानना है कि “शिक्षा हर व्यक्ति का पहला अधिकार है, इसके बिना जीवन अधूरा है।”
यह अभियान केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर भी विशेष ध्यान देता है। दया पांडा महिलाओं को हथकरघा जैसे पारंपरिक कार्यों से जोड़कर आर्थिक रूप से सशक्त बना रही हैं और उन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी देकर जागरूक कर रही हैं। साथ ही स्वास्थ्य जागरूकता और जैविक खेती को बढ़ावा देकर ग्रामीण जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले सहित कई गाँवों में यह अभियान सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है, जहाँ बच्चों को निःशुल्क पुस्तकें भी उपलब्ध कराई जाती हैं। दया पांडा की यह पहल न केवल शिक्षा का प्रसार कर रही है, बल्कि एक जागरूक, सशक्त और आत्मनिर्भर समाज के निर्माण की मजबूत नींव भी रख रही है।

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