चिंता: जौनसार-बावर में बूढ़ी दीपावली की शान ‘’चिवड़ा’’ पर संकट

देहरादून। जौनसार-बावर क्षेत्र में बूड़ी दीपावली के दौरान तैयार किए जाने वाले पारंपरिक व्यंजन ’चिवड़े’ का महत्व सदियों से रहा है, लेकिन अब यह व्यंजन धीरे-धीरे अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। क्षेत्र में बढ़ते पलायन, रोजगार की तलाश और बच्चों की शिक्षा के लिए परिवारों का विस्थापन होने के कारण घरों में लोग कम बचे हैं, जिसके चलते मेहनत से तैयार होने वाला यह व्यंजन अब बाजार के आर्टिफिशियल विकल्पों से प्रतिस्थापित होता जा रहा है। इससे स्थानीय बुजुर्ग समाज गहरी चिंता और दुख व्यक्त कर रहा है।
जौनसार-बावर जनजातीय क्षेत्र में देशभर में मनाई जाने वाली दीपावली से ठीक एक माह बाद बूड़ी दीपावली मनाने की परंपरा है। इस पर्व में ’धान को सात दिन भिगोकर, भूनकर और ओखली में कूटकर’ बनाया जाने वाला शुद्ध चिवड़ा विशेष महत्व रखता है। इसे माहसू देवता को जलाए जाने वाले ’होला’ के समय प्रसाद के रूप में भी चढ़ाया जाता रहा है। ककाड़ी गांव के 90 वर्षीय धन सिंह बिष्ट और बोहरी गांव के 103 वर्षीय गुलाब सिंह चौहान बताते हैं कि पहले चिवड़ा पूरी शुद्धता और स्वाद के साथ घरों में तैयार होता था, लेकिन अब बाजार से खरीदे गए चिवड़ों में वह स्वाद और धार्मिक पवित्रता नहीं रही। उनका कहना है कि आधुनिक जीवनशैली और तेजी से बदलते परिवेश के कारण जौनसारी परंपराएं धीरे-धीरे धुंधली पड़ती जा रही हैं, जिससे समाज की सांस्कृतिक विरासत पर खतरा मंडरा रहा है।
