वन विभाग की अनुमति भी संदेह के घेरे में, गंगा के इको-सेंसिटिव जोन में निर्माण पर नियमों की अनदेखी के आरोप
उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो,
हरिद्वार। धार्मिक नगरी हरिद्वार में गंगा किनारे चल रहे घाट निर्माण कार्य को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। गंगा तट पर सैकड़ों हरे-भरे पेड़ों की कटाई के बाद अब यह मामला पर्यावरणीय और कानूनी जांच का विषय बनता जा रहा है। स्थानीय लोगों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरणविदों ने आरोप लगाया है कि घाट निर्माण कार्य में नियमों की अनदेखी करते हुए प्रकृति को भारी नुकसान पहुंचाया गया है।
पेड़ों की कटाई: अनुमति पर सवालघाट निर्माण के लिए गंगा किनारे बड़ी संख्या में पेड़ों को काटा गया। अब मुख्य प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या इस कटान के लिए वैध अनुमति ली गई थी या नहीं।
यदि अनुमति ली गई है, तो यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि वह Forest Conservation Act 1980 के तहत दी गई या किसी अन्य स्थानीय प्रावधान के आधार पर।
NGT नियमावली की अनदेखी के आरोपगंगा नदी और उसके तटवर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए National Green Tribunal (NGT) द्वारा सख्त दिशा-निर्देश तय किए गए हैं।
इन दिशा-निर्देशों के अनुसार:
नदी के किनारे एक निश्चित दायरे में निर्माण कार्य प्रतिबंधित या नियंत्रित होता है
किसी भी परियोजना से पहले Environmental Impact Assessment (EIA) कराना अनिवार्य है
प्राकृतिक तंत्र, हरित क्षेत्र और नदी प्रवाह को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता
ऐसे में यदि घाट निर्माण कार्य बिना इन प्रक्रियाओं का पालन किए किया गया है, तो यह NGT के आदेशों का सीधा उल्लंघन माना जाएगा
विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा के तटीय क्षेत्रों को Eco-Sensitive Zone और कई स्थानों पर Flood Plain Zone माना जाता है, हरिद्वार जैसे धार्मिक और संवेदनशील क्षेत्रों में नियम और अधिक सख्त होते हैं
वन विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे मेंयदि वन विभाग द्वारा पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है, तो अब यह जांच का विषय बन गया है, क्या अनुमति देते समय सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया? क्या NGT के दिशा-निर्देशों और पर्यावरणीय मंजूरी (EC) को ध्यान में रखा गया?
क्या उच्च स्तर (केंद्र/राज्य) से आवश्यक स्वीकृति प्राप्त की गई?
यदि इन बिंदुओं की अनदेखी हुई है, तो वन विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ सकती है।
स्थानीय लोगों में आक्रोश, जांच की मांगप्रकरण में स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि गंगा किनारे हरियाली को नष्ट कर विकास के नाम पर पर्यावरण से खिलवाड़ किया जा रहा है।
निष्कर्षहरिद्वार, जो आस्था और प्रकृति का संगम है, वहां इस तरह के मामलों का सामने आना गंभीर चिंता का विषय है। विकास कार्यों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि यह विकास पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रखकर किया जा रहा है, तो इसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन, वन विभाग और संबंधित एजेंसियां इस पूरे मामले में क्या कदम उठाती हैं और क्या गंगा तट की पारिस्थितिकी को बचाने के लिए ठोस कार्रवाई की जाती है।
