जो भवसागर से तार दे, वो हैं माँ तारा: पं. विष्णु पाठक

हरिद्वार। पं. विष्णु पाठक ने कहा कि भगवती तारा को शास्त्रों और पौराणिक ग्रंथों में अत्यंत विशिष्ट स्थान प्राप्त है। दस महाविद्याओं में उनका दूसरा स्थान माना गया है। देवी भागवत में उन्हें उग्र और करुणामयी स्वरूप की देवी बताया गया है।
माँ तारा का प्रमुख शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में रामपुरहाट रेलवे स्टेशन के समीप स्थित तारापीठ को माना जाता है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहाँ सती की आँख की पुतली गिरी थी, इसलिए इसका नाम तारापीठ पड़ा। माँ तारा का स्वरूप नीले वर्ण का बताया गया है। उनके गले में मुंडमाला और हाथों में तलवार, कमल तथा कैंची सुशोभित रहते हैं। उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की देवी तथा नील सरस्वती भी कहा जाता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय शिव को विष से बचाने हेतु देवी ने तारा रूप धारण कर उन्हें दुग्ध पान कराया। तारापीठ तंत्र साधना का प्रमुख सिद्ध पीठ माना जाता है।
