होली: रंगों से आगे समाज को जोड़ने वाला उत्सव


देहरादून। भारत में त्योहार केवल परंपरा या मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को जीवित रखने वाली सांस्कृतिक संस्थाएँ हैं। होली इसका सशक्त उदाहरण है। आज जब इसे केवल रंगों और बाज़ार तक सीमित किया जा रहा है, तब उसके सामाजिक अर्थ को समझना आवश्यक है।
समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम के अनुसार सामूहिक अनुष्ठान सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं। होली इसी सामूहिकता का सार्वजनिक उत्सव है। जब लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तो वे केवल आनंद साझा नहीं करते, बल्कि सामाजिक दूरियों को प्रतीकात्मक रूप से कम करते हैं। यह त्योहार याद दिलाता है कि समाज नियमों से नहीं, भावनात्मक जुड़ाव से चलता है। आधुनिक जीवन के तनाव के बीच होली सामूहिक “मुक्ति तंत्र” की तरह कार्य करती है। यह मानसिक संतुलन और सामाजिक ऊर्जा का नवीनीकरण करती है।
व्यावसायीकरण के दौर में चुनौती यह है कि होली संबंधों का नवीनीकरण बनी रहे, केवल उपभोग का अवसर न बन जाए। वास्तव में, होली विश्वास, संवाद और सामाजिक पूंजी का वार्षिक पुनर्निर्माण हैकृसमाज का जीवंत आईना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share
error: Content is protected !!