1986 में 25 करोड़ में सम्पन्न हुआ था कुंभ, इसबार है 1224 करोड़ रुपए का बजट
उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो / कुमार दुष्यंत,
हरिद्वार। हरिद्वार में कुंभ अर्धकुंभ के आयोजनों पर महंगाई की मार पड़ती रही है।जिसके कारण चार दशक के भीतर ही इन महामेलों के बजट में सैंकड़ों करोड़ की वृद्धि हो गई है।
कुभं, अर्धकुंभ का बजट हर छह साल के अंतराल में कई गुना बढ़ता रहा है। जिसके कारण कभी केवल 25 करोड़ में सम्पन्न होने वाला कुंभ का बजट आज सवा बारह सौ करोड़ के अर्धकुंभ तक पहुंच गया है। वर्ष दर वर्ष बढ़ते इन महामेलों के बजट में केंद्र सरकार का अनुदान भी शामिल रहा है।
1986 के कुंभ में तत्कालीन उप्र सरकार ने कुंभ के लिए 25 करोड़ रुपए का बजट जारी किया था। जबकि इसके छह साल बाद हुए अर्धकुंभ में बजट में 7 करोड़ की वृद्धि हुई और 1992 के अर्धकुंभ का बजट 32 करोड़ रूपए पहुंच गया। 1998 में आयोजित कुंभ में बजट सीधे सौ करोड़ रुपए बढ़ गया और मेला 132 करोड़ रुपए में सम्पन्न हुआ। इसके छह साल बाद उत्तराखंड गठन के बाद राज्य के पहले अर्धकुंभ के लिए तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार ने 212 करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत किया। 2010 में 317 करोड़ से कुंभ सम्पन्न हुआ। 2016 का अर्धकुंभ हरीश रावत सरकार ने 538 करोड़ से सम्पन्न किया, जिसमें दो सौ करोड़ का अनुदान केंद्र ने दिया। कोविड के साये में 2021 में हुए पिछले कुंभ के लिए सात सौ करोड़ रुपए का बजट रखा गया था। जबकि 2027 के आसन्न अर्धकुंभ के लिए 1224 करोड़ का परिव्यय प्रस्तावित है। यह इन महामेलों का अबतक के इतिहास का सर्वाधिक बजट है। केंद्र ने इसके लिए अबतक पांच सौ और राज्य सरकार ने दो सौ करोड़ रुपए जारी भी कर हैं।

2004 में बच गया था बजट
कुंभ, अर्धकुंभ के इतिहास में अभीतक ऐसा केवल एक अपवाद वर्ष 2004 में रहा है, जबकि कुल 212 करोड़ के बजट में से दो सौ करोड़ ही खर्च हुए और 12 करोड़ रुपए बच गए, जो बाद में शासन को वापस भेज दिए गए। रोचक बात ये भी है कि तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार के कार्यकाल में हुए इस अर्धकुंभ में अधिकाधिक स्थाई काम हुए। जिनमें मेलों पर्वों के लिए स्थायी मेला नियंत्रण टावर (सीसीआर), हरिद्वार
मेला चिकित्सालय, हरकीपैड़ी-चमगादड टापू पुल, भूपतवाला विधुत उप गृह, दो एसटीपी का निर्माण प्रमुख है। यह निर्माण आज भी उपयोग में हैं।
