फागुनी कांवड़ है प्राचीन कांवड़ यात्रा, राममंदिर आंदोलन में लोकप्रिय हुई सावन कांवड़
उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो / कुमार दुष्यंत,
हरिद्वार। हरिद्वार में आजकल चल रही शारदीय कांवड़ यात्रा को ही प्राचीन कांवड़ यात्रा माना जाता है। हालांकि भारी भीड़भाड़ के कारण अब लोग सावन के कांवड़ मेले को ही प्रमुख कांवड़ मेला मानने लगे हैं।
कांवड़ यात्रा का प्रचलित इतिहास करीब तीन सौ साल पुराना है हालांकि कुछ लोग इसे पौराणिक भी मानते हैं। एक कथा के अनुसार सतयुग में समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव के कंठ से विष का ताप शांत करने के लिए देवताओं ने उनपर सामूहिक रूप से जलार्पण किया था, तभी से कांवड़ की शुरुआत हुई। कुछ लोग भगवान राम, रावण और श्रवण कुमार से भी कांवड़ परंपरा को जोड़ते हैं। हालांकि उत्तर भारत में ज्यादातर कांवड़िए स्वयं को भगवान परशुराम द्वारा शुरू की गई कांवड़ परंपरा से जोड़ते हैं।
हरिद्वार में सावन और फागुन में कांवड़ मेले की परंपरा वर्षों से है। सावन भोलेनाथ का प्रिय मास है तो वर्ष की 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि केवल फागुन में आती है। अब से करीब चार दशक पूर्व तक हरिद्वार में केवल महाशिवरात्रि पर ही कांवड़िए प्रमुख रुप से जुटा करते थे। इस मेले में आमतौर पर ग्रामीण, किसान और उम्रदराज श्रद्धालु ही आया करते थे जो पूर्ण श्रद्धा भाव से वनों के रास्ते कांवड़ में कांच की शीशियों में पैदल जल लेकर जाया करते थे। जबकि सावन में सीमित संख्या में शहरी क्षेत्रों के श्रद्धालु प्रायः बसों, ट्रेनों और वाहनों में जल लेकर जाते थे। 80 के दशक से इन मेलों में युवाओं की भागीदारी बढ़ी खासकर राममंदिर आंदोलन के बाद सावन के कांवड़ मेले में युवाओं का प्रवेश हुआ और भीड़भाड़ बढ़ी। सावन के कांवड़ मेले को लोकप्रिय बनाने में प्रसिद्ध फिल्म निर्माता स्व: गुलशन कुमार की भी खास भूमिका रही, जिन्होंने सावन के दौरान हरिद्वार आकर कांवड़ मेले के दृश्यों को सेल्यूलाइट पर उतारा और शिव महिमा जैसी फिल्में बनाई। जिसके बाद सावन की कांवड़ यात्रा प्रसिद्ध होती गई। अब भीड़भाड़ की दृष्टि से लोग सावन के कांवड़ मेले को ही प्रमुख कांवड़ मेला मानने लगे हैं।
नये दौर की देन है डाक कांवड़
नये दौर में कांवड़ का स्वरूप भी बदल गया है। पहले जहां केवल बांस और खप्पचों की कांवड़ का चलन था वहीं अब सजावटी कांवड़, स्टील की कांवड़ बढ़ गई हैं। डाक कांवड़ भी पिछले तीन दशक से चलन में है। इसमें कांवड़िए समूह में वाहन में जल ले जाते हैं। वाहन के आगे समूह का कोई न कोई कांवड़िया दौड़ता रहता है और निर्धारित घंटों में यात्रा पूरी की जाती है। हालांकि फागुनी कांवड़ यात्रा में सजावटी,

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