कभी लोहड़ी-मकर संक्रांति पर सजते थे शुद्ध ऊन की लोईयों के बाजार
हाथ से बुनी ऊन के गरम कपडों का भी होता था बड़ा कारोबार

उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो / कुमार दुष्यंत,
हरिद्वार, 13 जनवरी। हरिद्वार में एक वक्त लोहड़ी व मकर सक्रांति पर गरम ऊनी लोईयों के बाजार सजा करते थे। तब बाहर से गर्म लोईयां और ऊनी सामान बेचने के लिए आने वालों से हरिद्वार की धर्मशालाएं इन सामानों की मंडियां बन जाया करती थी। लेकिन अब यह अतीत की बात रह गई है।
करीब ढाई दशक पूर्व तक जनवरी के पहले सप्ताह से हरिद्वार में हरकी पैड़ी के आसपास के क्षेत्र में स्थित धर्मशालाओं में हाथ से बुनी ऊन की लोईयों, मफलर, टोपी, पट्टू आदि ऊनी सामान के अस्थायी बाजार सज जाया करते थे। हरकी पैड़ी के आसपास भारती भवन, मंडी हाऊस, शिव विश्राम गृह, करोड़ीमल धर्मशाला, शिमला हाऊस, बड़ा जोगीबाड़ा, पटनीमल हाऊस, बीकानेर धर्मशाला, बिंद्रावन धर्मशाला, खुशीराम आदि
धर्मशालाओं और भवनों में इस दौरान हिमाचल , कश्मीर और उत्तराखंड के पहाड़ी और ठंडे इलाकों के घरेलू ऊन उत्पादक गर्म वस्त्रों की अस्थायी दुकानें सजा लिया करते थे। इनके आगमन से तब यह भवन लोईयों और गरम सामान की छोटी मंडियों में तब्दील हो जाया करते थे।
हजारों की संख्या में आनेवाले ये छोटे कारोबारी लोहड़ी व मकर सक्रांति स्नान के लिए जब हरिद्वार आते थे तो अपने साथ वर्ष भर में तैयार गर्म वस्त्र भी बेचने के लिए साथ ले आते थे। इनका यह सामान यहां हाथों-हाथ व अच्छे दामों पर बिक जाया करता था। स्थानीय लोगों के साथ यात्री भी हाथ और खड्डी से बने इन शुद्ध ऊन के कपड़ों और लोईयों के खरीदार हुआ करते थे।

हरिद्वार के दुकानदार और पंडे पुरोहित तो पूरे वर्ष जनवरी में कुछ दिन के लिए सजने वाले इन बाजारों की प्रतीक्षा किया करते थे। उस दौर में हरिद्वार के यह ऊनी बाजार प्रसिद्ध थे और आसपास के प्रांतों से भी लोग हरिद्वार में मिलने वाली शुद्ध ऊन की हाथ से बनी लोईयों, पट्टू, मफलर, जुराबें, गर्म टोपियां खरीदने के लिए यहां आया करते थे। इन बाजारों में ठंडे प्रदेशों में घरों में कपड़ों के अंदर पेट पर लटकाई जानें वाली सिगढ़ी, घरों में पहनी जाने वाली घास की जूतियां भी मिल जाया करती थी लेकिन लोईयों की खरीदारी बड़े पैमाने पर होती थी। गढ़वाल के चौरपानी व हिमाचल
के रामपुर बुश्यारा व मंडी की लोईयां यहां हाथों हाथ बिक जाया करती थी। हाथ से बुने ऊनी कपड़े की भी भारी डिमांड रहा करती थी। जिसके हरिद्वार के पुराने लोग व पंडे-पुरोहित बड़े ग्राहक हुआ करते थे जो इसी हाथ से काते गए ऊनी कपड़े से बने कोट-जैकेट में ही अपनी सर्दियां गुजारा करते थे। आमतौर पर मकर सक्रांति के दिन तक इन छोटे कारोबारियों का सब माल बिक जाया करता था और यह लोग सक्रांति स्नान कर मुनाफे के साथ वापस लौट जाते थे। उत्तराखंड बनने के बाद यह बाजार धीरे-धीरे सिमट गये। अब क्योंकि हाथ से से बुनें इन शुद्ध ऊनी कपड़ों व लोईयों की विदेशों में भी भारी डिमांड है। जबकि उसके सापेक्ष उत्पादन काफी कम है। जिससे अब बडे एजेंट और निर्यातक इन छोटे कारोबारियों के आवासों पर ही माल खरीदने पहुंच जाते हैं। आनलाइन के चलन से भी इन कुटिर उत्पादकों का सामान घर बैठे अच्छे दामों पर बिक जाता है। जिसके कारण
इन कारोबारियों ने बिक्री के लिए हरिद्वार आना बंद कर दिया। इसके साथ ही
लोहड़ी और सक्रांति के यह पारंपरिक बाजार सिमट गए।
