पौष की कपकपाती ठंड में होती है लोकदेवता की कठिन साधना

भुवन बिष्ट/उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो
रानीखेत। देवभूमि में अटूट आस्था का सदैव ही संगम होता है। आस्था सब पर भारी पड़ती है, देवभूमि उत्तराखण्ड के गांवों में लोकदेवता के प्रति सदैव ही लोगों की गहरी आस्था रहती है और जन लोक कल्याण के लिए समय समय पर इन लोकदेवता के मंदिरों में विभिन्न भक्ति कार्यक्रमों, अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। पौष (पूष) माह की कंपकपाती ठंड पर भी आस्था कैसे भारी पड़ती है इसका एक उदाहरण है लोकदेवता के मंदिरों में होने वाली पौष अर्थात पूस की बैसी,जो एक कठिन साधना के रूप में जानी जाती है।
बैसी का शाब्दिक अर्थ बनता है बाईस दिनों का भक्ति कार्यक्रम। बैसी मुख्य रूप से श्रावण मास व पौष (पूस) के माह में आयोजित होती हैं तथा समय समय पर नवरात्रो आदि में भी इन मंदिरों में चहल पहल बनी रहती है किंतु बैसी का अपना एक विशेष महत्व माना जाता है जिसे सुख समृद्धि , शांति,सामाजिक उन्नति, गांवों की खुशहाली के लिए लाभदायक एंव फलदायी माना जाता है। बैसी निरंतर बाईस दिनों तक चलने वाला भक्ति कार्यक्रम है।
पूस मास में कंपकपाने वाली ठंड व पाला गिरने व अनेक बार बर्फ पड़ने से बहुत अधिक ठंड पड़ती है इसलिए इस माह आयोजित होने वाली बैसी को कठिन साधना के रूप में भी जाना जाता है ।लोकदेवता के इन मंदिरों में भक्तों की गहरी आस्था रहती है। बैसी में बाइस दिनों तक संन्यासी रूप में रहकर सात्विक विचार धाराओं से रहना पड़ता है। बैसी भक्ति संबधित व भक्ति से संबधित धार्मिक, आध्यात्मिक आयोजन है इसमें नियमित पूजा पाठ, भगवान को लगने वाला भोग व जागर आदि कार्यक्रमों का बहुत अधिक महत्व है। प्रातःकाल जल्दी उठकर ठंडे जल से स्नान , मंदिर स्वच्छता व पूजा कार्यक्रम किये जाते हैं। भोजन के पश्चात स्नान व सायंकालिन पूजा से पहले ठंडे जल से स्नान किया जाता है। संन्यासी व सात्विक विचार धारा से रहने के कारण बाईस दिनों तक पारिवारिक माया मोह का त्याग करके आराध्य लोकदेवता के मंदिर में रहा जाता है ।और केवल धोती, नंगे पांव (जूते चप्पल के बिना ) ही मंदिर में सेवा की जाती है। पूस माह में अत्यधिक व कंपकपाने वाली ठंड होने के कारण इसे कठिन साधना माना जाता है। बैसी में आराध्य लोकदेवताओं को भोग लगाया जाता है वैसे गांवों में हर अच्छे कार्य, त्यौहारों व परिवारों में विवाह समारोंहों के कार्याे के सफल आयोजनों की कामना व खुशहाली सुख समृद्धि के लिए भी लोकदेवता के मंदिरों में भोग लगाया जाता है। लोकदेवता हरज्यू, गुरूगोरखनाथ, सैम ज्यू, न्यायी गोलूदेवता के मंदिरों मे बैसी में लगातार जलने वाली ज्योति (धूनि) जलायी जाती है जो निर्बाध रूप से लगातार बैसी (बाईस ) दिनों तक जलते रहती है। और इससे बनने वाली राख (बभूति) को भक्त एवं मंदिर में आने वाले भक्त लगाते हैं। आधुनिकता भले ही परवान चढ़ रही हो किंतु अगाध अटूट आस्था इन सब पर भारी है देवभूमि के गांवों में लोकदेवता गुरू गोरखनाथ, हरज्यू, सैमज्यू, भूमियां देवता, न्यायी गोल्जयू महाराज,नरसिंग (नार्सिंगं) आदि देवी देवताओं के मंदिरों में वर्ष भर चहल पहल बनी रहती है।समय समय पर नवरात्रों व कठिन साधना बैसी का भी आयोजन किया जाता है। देवभूमि में सदैव ही अटूट अगाध आस्था का संगम होता है।महान देवभूमि की परंपराऐं संस्कृति, सभ्यता व आस्था विश्वविख्यात है।
सामाजिक खुशहाली की होती है कामना
बैसी का अपना एक विशेष महत्व माना जाता है जिसे सुख समृद्धि, शांति, सामाजिक उन्नति, गांवों की खुशहाली के लिए लाभदायक एंव फलदायी माना जाता है। बैसी निरंतर बाईस दिनों तक चलने वाला भक्ति कार्यक्रम है। श्रावण व पौस पूस की माह में बैसी का आयोजन किया जाता है। गहरी आस्था व श्रद्धा के कारण अनेक बार इन मंदिरों में भक्तों व डंगरियों द्वारा तिमाही (त्रैमासिक) व छःमासी ( छःमहिने का भक्ति कार्यक्रम ) भी आयोजित किये जाते हैं।
गहरी आस्था व कठिन साधना है बैसी
पूस मास में कंपकपाने वाली ठंड व पाला गिरने व अनेक बार बर्फ पड़ने से बहुत अधिक ठंड पड़ती है इसलिए इस माह आयोजित होने वाली बैसी को कठिन साधना के रूप में भी जाना जाता है । लोकदेवता के इन मंदिरों में भक्तों की गहरी आस्था रहती है ।
लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं ये देवी देवता
देवभूमि उत्तराखंड के गांवों में लोकदेवता के रूप में गुरू गोरखनाथ, हरज्यू, सैमज्यू, भूमियां देवता, न्यायी गोलज्यू महाराज,नरसिंग (नार्सिंगं) कालिका माता, देवी आदि देवी देवताओं को प्रमुखतः लोक देवता के रूप में पूजा जाता है। हर गाँव में इनके मंदिर बने होते हैं और समय समय पर इनमें धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
