Sun. Dec 15th, 2019

छात्रवृत्ति घोटाले में छात्रों और बैंकों की भूमिका भी संदेह के घेरे में

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नवीन चौहान
उत्तराखंड राज्य करीब 50 हजार करोड़ से अधिक के कर्ज में डूबा है। इस नवोदित राज्य में एक के बाद खूब घोटाले हुए। स्टर्डिया घोटाला, जमीन घोटाला, पुलिस भर्ती घोटाला और फिलवक्त सबसे चर्चित छात्रवृत्ति घोटाला। इस दौरान प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों की सरकार रही। लेकिन किसी भी सरकार ने इस राज्य के ना तो कर्ज को कम करने की दिशा में सार्थक पहल की ओर ना ही घोटालों पर लगाम लगाने की इच्छा शक्ति जाहिर की। जिसका नतीजा ये रहा कि राज्य का खजाना लूटता रहा और सरकार और उनके मंत्री सत्ता की मलाई खाने में व्यस्त रहे।
हद तो तब हो गई जब संबंधित विभाग के नौकरशाह से लेकर तमाम सरकारी अधिकारियों ने छात्रवृत्ति वितरण के दौरान अपनी आंखे बंद कर ली। सरकारी खजाना लुटता रहा लेकिन किसी ने खजाने की रखवाली नही की। जनता के टैक्स के पैंसों से वेतन वाले सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों ने धन की बंदरबांट को रोकने की जहमत नही उठाई। जिसका नतीजा ये रहा कि करीब 500 करोड़ की धनराशि छात्रवृत्ति घोटाले की भेंट चढ़ गई। अब चूंकि इस पूरे प्रकरण पर हाईकोर्ट की नजर बनी हुई है। तो इस घोटाले में तलवार कॉलेज संचालकों की गर्दन पर टिकी है।
जबकि इस घोटाले की पटकथा लिखी जा रही थी तो छात्र से लेकर विश्वविद्यालय के तमाम अधिकारी, कर्मचारी, समाज कल्याण विभाग के तमाम अफसर और बैंकों की भूमिका क्या रही होगी। इस पर विचार करना जरूरी है।
छात्रवृत्ति घोटाले में हाईकोर्ट के आदेश पर गठित एसआईटी ने कॉलेज संचालकों और समाज कल्याण विभाग के तत्कालीन अधिकारियों पर शिकंजा कसा था। तत्कालीन समाज कल्याण अधिकारी पुलिस के फंदे में है। लेकिन सवाल उठता है कि वो तमाम विश्वविद्यालय के अधिकारी, कर्मचारी, आडिटर और संबंधित मंत्रालय के सचिव तब क्या कर रहे थे जब छात्रवृत्ति की धनराशि का वितरण हो रहा था। उनको ये नजर क्यो नही आया। ये एक बड़ा और गंभीर सवाल है।
बताते चले कि उत्तराखंड में एससी—एसटी छात्रों को शिक्षा के लिए मिलने वाली छात्रवृत्ति में करीब 500 करोड़ के घोटाले की जांच चल रही है। ये जांच भी हाईकोर्ट के आदेश के बाद गठित एसआईटी कर रही है। एसआईटी ने भी कॉलेज संचालकों पर शिकंजा कसा हुआ है। कॉलेज संचालकों के खिलाफ सबूत जुटाकर उनको जेल भेजने का क्रम जारी है। लेकिन इस खेल के पीछे भी बहुत कुछ ऐसा है जो पूरे सिस्टम पर ही कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। फेल सिस्टम की पूरी कहानी को आप कुछ इस तरह समझ सकते है।
निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले गरीब एससी—एसटी छात्र—छात्राओं को सरकार की ओर से छात्रवृत्ति और शिक्षण शुल्क की राशि प्रदान की जा रही थी। साल 2011 से 2014 तक ये छात्रवृत्ति कॉलेजों को ही दी जा रही थी। कॉलेज प्रबंधन अपने तरीके से छात्रों को राशि प्रदान कर रहा था। एसआईटी ने जब इन कॉलेजों को आरोपी बनाया तो उन्होंने अलग—अलग कॉलेजों में एक ही छात्र के एडमिशन होने की बात सामने निकलकर आई। कुछ कॉलेजों में तो छात्रों का डाटा समाज कल्याण विभाग और विश्वविद्यालय को भेज दिया गया। जबकि छात्र कोई मौजूद ही नही था। ना ही किसी छात्र ने शिक्षा ग्रहण की। ऐसे में विश्वविद्यालय किन बच्चों का एनरोलमेंट कर रहा था। बच्चों की फोटो, नाम पते को तस्दीक क्यो नही किया गया। विश्वविद्यालय और समाज कल्याण विभाग ने इन बच्चों के बारे में जानकारी करने का प्रयास क्यो नही किया। जबकि साल 2014 के बाद छात्रों के खातों में ही छात्रवृत्ति की धनराशि आने लगी तो बैंक खाता तो छात्र का ही था। बैंक में खाता खोलने भी छात्र ही गया। तो छात्रवृत्ति की रकम लेने वाला एक ही छात्र अलग—अलग एडमिशन कैसे ले रहा था।
इससे भी बड़ी बात ये है कि जिनती संख्या में छात्रों को छात्रवृत्ति की राशि दी गई क्या उतने छात्र कॉलेजों में थे। अगर छात्र नही थे विश्वविद्यालय के लाखों रूपये सालाना वेतन लेने वाले बाबू किसका एनरोलमेंट कर रहे थे। सरकारी धन का आडिट करने वाले चार्टर एकाउंटेंट इन दस सालों में क्या कर रहे थे। उनकी आंखों से इतना बड़ा गड़बड़झाला कैसे बच गया। आखिरकार इसी की जांच करने के लिए तो उनको पैंसा दिया जाता है। समाज कल्याण विभाग मंत्रालय से जुड़े तत्कालीन नौकरशाहों ने इनको तस्दीक कराना मुनासिब नही समझा। सवाल वही मुंह बाये खड़ा है कि घोटाला हो रहा तो बाकी सब अधिकारी, कर्मचारी, बाबू, आडिटर, नौकरशाह कर क्या रहे थे। उनकी क्या जिम्मेदारी थी।
छात्रों ने सिस्टम फेलियर का लाभ उठाया और मौके पर चौका लगा दिया। अगर पहली ही बार छात्रों की करतूत पर शिकंजा कसा जाता तो शायद इतना बड़ा खेल ना होता। सरकारी खजाने का धन ना लुटता और ना ही दलालों, छात्रों और कॉलेज संचालकों के हौसले बुंलद होते। विजिलेंस जांच में भी एक बात तो साफ है कि छात्रों और उनके अभिभावकों ने छात्रवृत्ति की राशि को डकारने के लिए गेम में हिस्सा लिया। अगर वास्तव में इस खेल से परदा उठाना है तो कॉलेजों के साथ—साथ इन छात्रों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। कही ये चार—चार कॉलेजों में एडमिशन लेने वाले छात्र पढ़ना— लिखना छोड़कर सरकारी धन की लूट में शामिल तो नहीं थे। विजिलेंस जांच में भी एक बात को साफ हो गई है कि छात्रवृत्ति की राशि हड़पने के लिए सरकारी अधिकारियों ने अपने आय के गलत प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए। करीब 350 बच्चों के अभिभावकों की आय प्रमाण पत्र की जांच विजिलेंस कर रही है। जबकि ऐसे कई छात्र है जो एक ही छात्र ने कई कॉलेजों में एडमिशन दिखाकर छात्रवृत्ति हासिल की।
आखिरकार कुल मिलाकर देखा जाए तो इस बड़े खेल में सफेदपोश से लेकर तमाम अधिकारियों की मिलीभगत रही। या कुछ ये कहा जाए कि रोम जलता रहा और नीरो बंसी बजाते रहे।

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