Mon. Nov 18th, 2019

मिटटी के दीपक बेचकर मनायेंगी दीपावली, पलक की कहानी

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नवीन चौहान
भारत की बेटियों ने अपने शौर्य और पराक्रम से यूं तो कई कीर्तिमान स्थापित किए है। बेटियों ने समाज के हर क्षेत्र में अपनी काबलियत को दर्शाया है। ​शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र में जनसेवा की तो वही दूसरी ओर सेना में भर्ती होकर अपनी ताकत से दुश्मनों के दांत खट्टे किए है। बेटियों की शौर्य गाथाओं से इतिहास के पन्ने भरे पड़े है। लेकिन 21 वीं सदी में आते—आते बेटियों में नई ऊर्जा का संचार हो रहा है। उत्साह से लबरेज बेटियां पुरूषों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर रही है। ऐसी ही एक हरिद्वार की बेटी है पलक। पलक को ना ही मोदी सरकार की किसी योजना की जरूरत है और ना ही अपने गरीब होने का कोई अफसोस। वह खुली आंखों से सपना देखती है उनको पूरा करने के लिए पढ़ाई करती है। वह खाकी वर्दी पहनकर पुलिस अफसर बनना चाहती है। पलक पुलिस की वर्दी पहनकर जनसेवा करना चाहती है। लेकिन फिलहाल वह दीपावली पर्व को पूरे उत्साह से मनाने के लिए मिटटी के दीपक बेच रही है। पलक अपनी जिंदगी में पूरी खुश है। तीसरी कक्षा की इस छात्रा का उत्साह किसी को भी जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देंगा।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की सत्ता संभालने के ​साथ ही साल 2014 में बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं का नारा दिया और इस मुहिम को आगे बढ़ाया। मोदी सरकार ने बेटियों की रक्षा और सुरक्षा के लिए कई प्रभावशाली योजनाओं को लागू किया। लेकिन मोदी सरकार की तमाम योजनाओं का लाभ आम जन मानस और जरूरतमंदो तक नहीं पहुंच पाया। मोदी सरकार ने सरकारी अधिकारियों को कभी गरीब की चौखट तक नही भेजा। जिसका नतीजा ये रहा कि गरीबों ने अपनी गरीबी को भाग्य दोष समझकर खुद ही दूर करने का संकल्प कर लिया।
फिलहाल हम बात कर रहे है पलक की। हरिद्वार के ज्वालापुर कोतवाली क्षेत्र की रेल चौकी से कटहरा बाजार की ओर जाने वाली सड़क पर एक एटीएम के बाहर एक आठ साल की मासूम बच्ची मिटटी के दीपक बेच रही है। जबकि उसी के बराबर में एक 70 साल की बुजुर्ग महिला भी दीपक बेच रही है। बाजार का जायजा लेने निकली दैनिक उत्तराखंड अखबार की टीम की नजर इस मासूम बच्ची पर गई तो बात करने की इच्छा हुई। बच्ची ने पूछताछ में अपना नाम पलक बताया। पलक ने बताया कि वह तीसरी कक्षा में पड़ती है। उसका पढ़ाई में मन लगता है। जब पलक से दीपक बेचने की वजह पूछी तो उसने बताया कि वह दीपावली पर्व के लिए कमाई कर रही है। उसने आज दिनभर में 60 रूपये के दीपक बेचे है। जबकि उसके पिता दूसरे स्थान पर बेच रहे है। पलक की आंखों में चमक देखकर और आत्मविश्वास गजब का दिखाई दिया। पलक से जब पूछा गया कि पढ़ाई करके क्या बनना चाहती है तो उसने बताया कि वह पुलिस बनना चाहती है। पलक ने बताया कि पुलिस जनता की सुरक्षा और सेवा करती है। बाकी सभी तो नौकरी करते है। पलक के छोटे मुंह से यह बात सुनकर हम चकित रह गए। एक बेहद गरीब परिवार में जन्म लेने वाली मासूम सी पलक खुली आंखों से सपने देखती है। उसको मोदी सरकार की किसी योजना की कोई जरूरत नही है। वह अपने सपनों को खुद पूरा कर लेंगी। स्वाभिमानी इंसान में कार्य करने की ऊर्जा और मानवीय गुण दूसरे इंसानों से ज्यादा होते है।
पलक को आशीर्वाद देकर हम आगे बढ़ने वाले ही थे हमारी नजर पास में ही मिटटी के दीपक बेचने वाली एक 70 साल की बुजुर्ग महिला पर गई। इस माई की कहानी भी बेहद मार्मिक है। दो बेटों की मां जीवन के इस मोड़ पर आकर खुद पेट भरने के लिए कार्य करती है। जी हां स्वाभिमान की दूसरी मिशाल यहां देखने को मिली। बेटों की दुत्कार और बहुओं के अपमान से आजिज आकर इस माई ने घर छोड़ दिया। माई ने बताया कि खुद सब्जी बेचने का कार्य करती है और अपनी रोटी के लिए पैंसे जुटाती है। फिलहाल वह दीपक बेच रही है। माई ने बताया कि उसने बेटों को पढ़ाया और काबिल बनाया। लेकिन शादी के बाद वह बदल गए। पति की मौत के बाद उसका अपमान होने लगा। इसी कारण वह अलग रहने लगी और खुद कमाई करती है। माई में 70 साल की आयु में स्वाभिमानी होने की चमक दिखाई पड़ रही थी।
पलक और माई तो दो बेटियां है। पलक को जीवन में आगे बढ़ना है। जीवन के कठिन संघर्ष के दिनों से पार पाकर मंजिल हासिल करनी है। माई ने जीवन के कठिन दौर का सामना कर लिया। लेकिन इन दोनों के बीच जो समानता दिखाई दी वह स्वाभिमान और संघर्ष की रही। दोनों बेटियों ने जीवन से हार नही मानी और ना ही भाग्य को कोई दोष दिया। कर्म को प्रधान माना और आगे बढ़ रही है। ये दोनों प्रेरणादायक है उन लोगों के लिए जो भाग्य का रोना रोकर जिंदगी से निराश हो जाते है।

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